जीवन का एकमात्र लक्ष्य है सुख, महासुख, तथा परमसुख की यात्रा !
सुख है समस्थ भौतिक संसाधनों की प्राप्ति
महासुख है अपने ईष्टदेव के दर्शन
तथा परमसुख है अपने ईष्टदेव के साथ एकाकार हो जाना
“I don’t need 1000 so called good people, but I need only 60 Rebels, who can work with me to throw off recent Lord Macaulay Education System whose purpose was to produce slaves &to implement our INDIAN EDUCATION SYSTEM, so that again we could stand in front of the world as King”.




“All Mothers are God gifted quality of Mother Lioness, but all children have to try hard to become Lion hearted Cubs.” Anshuman Krishnamitra
हमें अपनी आत्मा को परमात्मा के साथ आनंदमग्न रहने देना चाहिए, अपने मन को प्रभु की पूजा और सेवा में रत रखना चाहिए तथा अपनी बुद्धि और शरीर को सांसारिक कार्यो में लगाना चाहिएं !
जय श्रीकृष्ण
‘ वह बात तुम मन में ही न लाओ, जो तुम व्यक्त नहीं करना चाहते। अगर तुम स्वास्थ्य चाहते हो, तो स्वस्थ विचार अपने मन में धारण करो। यदि तुम समृद्धि एवं खुशी चाहते हो, समृद्धि एवं खुशी का ही विचार करो। तुम जैसा बनना चहते हो, सिर्फ वैसा ही विचार करो। उल्टा-सीधा मन में न लाओ।‘
-स्वामी विवेकानंद
‘‘कौन सा ऐसा अक्षर है, जिसमें मन्त्र बनने की शक्ति न हो, कौन सी ऐसी वनस्पति है जिसमें औषधि का अंश न हो, कौन सा ऐसा मनुष्य हैं जिसमें कोई गुण न हो, सिर्फ इन्हें पहचान कर इनका प्रयोग करने वाले नहीं मिलते।‘‘
’ श्रीकृष्ण की गीता को समझने के लिए भुजाओं में बल होना चाहिए और श्रीकृष्ण को जानने के लिए व्यक्ति में शक्ति का संचार होना चाहिए।’
-स्वामी विवेकानन्द जी
श्रीकृष्णलीला रहस्य (युद्ध लीला)

Krishna and Balaram defeated Jarasandha army 17 times
जरासंध युद्ध- जरासंध को 17 बार पराजित करके 18 वीं बार प्रभु ने मथुरा की जनता के साथ गुजरात की तरफ द्वारिका को प्रस्थान किया। प्रभु चाहते तो उसके पहली बार में परास्त करके उसका वघ कर देते परन्तु जरासंघ भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। तो शिवजी ने श्रीकृष्ण से अपने भक्त का स्वयं वध न करने के लिये विनती की। इसीलिए प्रभु ने उसके बल का घमण्ड नष्ट करने के लिए हर बार परास्त किया पर वध नहीं किया। परन्तु इस युद्ध में निर्दोष जनता और सेना व्यर्थ ही प्रभु ने द्वारिका में प्रजा को भेजने का निश्चय किया। जैसे की ज्ञात हो अंधक बंशी मथुरा के तथा वुष्णी वंशी द्वारिका पुरी के शासक हुए। मथुरा में जिस समय उग्रसेन और कंक थे उस समय द्वारिका में शूर के पुत्र वासुदेव जी राजा थे। उस समय शूरसैन जनपद राष्ट्र के 16 जनपदों में एक था। द्वारका में मेहनत से नयी राजधानी बसायी। कुछ वर्षो पश्चात जब जरासंध ने एक यज्ञ में जब भगवान शिव को प्रसन्न करन के लिये मनुष्य बली देनी चाही तो राजाओं ने प्रभु श्रीकृष्ण से मद्द मॉगी तो श्रीकृष्ण ने शिवजी से विचार विमर्श करके यह निर्णय किया कि भक्ति में मानव बलि जैसा जघन्य कृत्य एक गलत प्रथा को जन्म दे सकता है। इसीलिए शिवजी से भी अनुमति प्राप्त कर श्रीकृष्ण गुप्त रूप से भीम और अर्जुन संग इस पाप को समूल नष्ट करने निकल पड़े। गुप्त रूप से इसलिए कि कहीं युद्ध की भनक लगते ही जरासंघ उन निर्दोष राजाओं का चुपचाप वध न करवा दे।प्रभु ने स्वयं उसका वध इसलिए नहीं किया क्योंकि वह पहले ही भगवान शिव को इस बात का वचन दे चुके थे ,ठीक बाणसुर की तरह। तो भगवान ने कुंठाग्रस्त जरासंघ की बुद्धि फेर दी तथा इस युद्ध से तीन प्रमुख कार्य संपन्न हो गये थे। राजाओं की प्राणरक्षा, भीम के अहंकार का नाश तथा जरासंघ का वध। सब कुछ प्रभु की प्रेरणा के अनुरूप हुआ।’’
कालयवन युद्ध- ’’कई कार्य जब एकत्र होते है तब प्रभु द्वारा उनकी एक लीला क्रियान्वित होती है। कुछ कारण हमें ज्ञात होते हैं तथा कुछ नहीं । भगवत्कृपा से एक कारण आपके समक्ष रखने का शिशुवत् प्रयत्प कर रहा हूँ।
जैसा की ज्ञात है कि इस युद्ध मे रणछोड़जी महाराज का वहाँ से दौड़ना तथा मुचकुद को भगवान के चर्तुभुज रूप के दर्शन इन सारे घटनाक्रम पर ध्यान देने से ज्ञात होता है कि मुचकुदं पिछले जन्म मे प्रभु श्रीकृष्ण जी का परम भक्त था तथा प्रभु के दर्शन तथा उनकी लीला मे ंप्रभु का सहयोग करने की उसकी बड़ी उत्कट इच्छा थी। परन्तु साधना दूसरे जन्म में पूर्ण हुयी वह भी तब जब श्रीकृष्ण युद्ध भिम में थे। तब मुचकुंद को वर देने के लिए प्रभु युद्ध भूमि छोड़ भक्त की तरफ भागे जैसे हाथी को बचाने सिंहासन छोड़ भागे तथा भीष्म की प्रतिज्ञा को पूर्ण करने हाथमें रथ का पहिया उठा अपनी प्रतिज्ञा तोड़ भीष्म पितामह की ओर भागे परन्तु अर्जुन श्रीकृष्ण के पावं पकड़े खीचे रहा है कि प्रभु की प्रतिज्ञा न टूटे। ठीक अर्जुन की तरह हम लोग भी समझते रहे कि प्रभु कालयवन् को देख युद्ध भमि से भागे। अरे! कंस जैसे दानव को दो मुठ्ठी में मार दिया, गोवर्धन को एक नख पर धारण किया, पूतना, अधासुर, बकासुर जैसे अनेको मायावी तथा बलवान दानवों को खेल-खेल में तार दिया, जरासंध को 18 बार पराजित किया, तो कालयवन जैसा विदेशी यवन आकां्रता कहां की चीज ठहरा। प्रभु तो कालयवन को अपने पीछे भगा रहे थे तथा वे अपने भक्त की तरफ भाग रहे थे। भक्त की मनोकामना की पूर्ति के लिए प्रभु ने रणछोड़ नाम भी स्वीकारा।
मुचकुंद गुफा में प्रभु ध्यान में एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे थे पर उस योगनिद्रा को भंग करने वाले कालयवन को एक दृष्टि मे जलाकर भस्म किया और प्रभु की लीला में सहयोगी पात्र बने जैसे रामायण मे हनुमान, सुग्रीव, आदि। तत्पश्चात प्रभु के चतुर्भज रूप के दर्शन कर के उपदेश ग्रहण किया और मोक्ष को प्राप्त हुए।’’
निष्कर्ष-
इन दो घटनाओं से हमें यह सबक लेना चाहिए कि भगवतलीला रहस्यों को हमें सिर्फ मानवीय दृष्टि तक सीमित नहीं रखना चाहिए बल्कि अंर्तमन के ज्ञानचक्षुओं के द्वारा प्रभु लीला में दिव्य पक्ष देखने का प्रयत्न करना चाहिए तथा सत्य को जानने का प्रयत्न करना चाहिए ।
जय श्रीकृष्ण
अंशुमान ’कृष्णमित्र’
माखनचोरी लीला

’’प्रभु का एक नाम उनके भक्तें ने माखनचोर भी रखा है। भक्तों को तो इसी नाम मे रस आता है। परन्तु सामान्य बुद्धि वालों के संशय को दूर करने के लिए स्पष्ट करना चाहता हूँ कि प्रभु नंदराज जी के पुत्र थे जिनके लाखों की संख्या में गाएॅं थी तथा घर मख्खन, छाछ आदि से भरा रहता था तथा उन्हें खाने की भी कमी न थी परन्तु माखनचोरी लीला से प्रभु के दो कार्य संपादित होत हैं। पहला तो गॉव के वे बच्चे जिनको माखन उपलब्ध न था तो वे कन्हैया की शरण में आते और विनती करते, क्योंकि सीधे मुॅह तो उन्हें माखन मिलता नहीं क्योंकि गांव का मख्खन मथुरा में कंस को क्रय के रुप में भेजा जाता था और गॉव के बच्चे इससे वंचित रह जाते, इसलिये के लिए प्रभु ग्वाल -बालो तथा बंदरो को मख्खन बॉटते परन्तु स्वयं डॉट-मार खाते। प्रभु का एक संकेत और था कि दुष्ट कंस के भय से कर के रूप ढेरसारा माखन व्यर्थ ही मथुरा ही जाए और गो-सेवा करने वाले उसका प्रसाद भी न पाए? ऐसा अन्याय भला कभी नटखट कन्हैया यह सकेंत हैं क्या ?
दूसरा कार्य गोपियों का आत्मभिमान परिपुष्ट करना था गोपियों इस बात का इंतजार करती कि कब कान्हा किसके घर माखन लेने जाए। और जब प्रभु को ऐसा करते देख वे प्रभु को पकड़ कर उलाहने देती, अपनी सखियों को बता कर प्रसन्न होतीं की कान्हा आज उनके घर आया यशोदा मॉ के पास ले जाती तथा यह सब करके उन्हें संतुष्टि मिलती है कि वे किसी तरह कृष्ण से जुड़ी हैं। ठीक वैसे ही जब हमोरे खनदान का कोई भी, व्यक्ति उॅचाईयों को छू ले तो हर व्यक्ति उनसे एक रिश्तेदारी जोड़कर गौरच महसूस करता है। ठीक उसी तरह गोपियो भी यह दर्शाकर कि आज कान्हा ने उनके घर से माखन चुराया, यह भाव गोपियों को आत्मसंतुष्टि का भाव प्रदान करता है।’’
जय श्री कृष्ण
अंशुमान ’कृष्णमित्र’
