“I’am very glad to present the Divine Discussion held between Bhagwan Shree Krishna and His Devotee Arjuna, which is described in detail in the Worlds Largest Epic “MAHABHARATA”! Here the conversation is presented in very easy and poetic manner so that each and every person can understand and enjoy it like a story!
By Anshuman Bajpayee “Krishnamitra”
‘‘अब युद्धारम्भ की पहले भोर में सब अपने-अपने तम्बुओं में अपने-अपने ईष्टदेवों को प्रसन्न करने का प्रयत्न कर रहे थे। पूरा कुरूक्षेत्र हवन के धुँए से भर का पवित्र हो गया। क्योंकि इसी सुबह गीता का महान उपदेष संसार को दिया जाना था। भीष्म, द्रोण, गायत्री की, भीम वायु की, दुर्योधन अग्नि की, युद्धिष्ठिर इन्द्र की तथा अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण की प्रार्थना कर ही रहा था कि प्रभु बीच में ही आ गए और अर्जुन को रोकते हुए बोले कि ‘हे अर्जुन पहले तुम्हें जगत की आदिषक्ति तथा विजय प्रदायिनी दुर्गा जी की आराधना करनी चाहिए और, विजय, का आषीष माँगो। अर्जुन- पर मेरे साथ तो साक्षात परमात्मा हैं।’’ श्रीकृष्ण-‘‘वह तो ठीक है अर्जुन परंतु प्राकृतिक नियम और दैवीय विधानों का भी पालन करना विजयश्री के लिए आवष्यक है। ’’फिर प्रभु की आज्ञा मानकर अर्जुन ने दुर्गाजी ने नौ नामों की स्तुति की। तत्पष्चात् दुर्गा जी ने दर्षन देकर कहा ‘‘युद्ध में अंतिम विजय तुम्हारी ही होगी।’’ फिर पांडव सेना के सेनापति धृष्टद्युम्न और कौरव के भीष्म थे। अर्जुन ने अपने ईष्ट और सारथी श्रीकृष्ण से रथ दोनों सेनाओं को मध्य ले चलने का कहा। भीष्म, द्रोणादि को देख बचपन के दिन याद आने लगे तथा युद्ध के समय वीर रस की जगह भाव रस उसमें प्रधान होने लगा। उसका आत्मविष्वास जाता रहा। तब श्रीकृष्ण ने उसे बताया कि ‘‘पांडवों में देखें कैसे भीम अपनी प्रतिज्ञाओं को पूर्ण करने को उत्सुक है, तथा इतने अपमान और तपस्या सहने के बाद युद्ध के अवसर का पूर्ण लाभ उठाना चाहते हैं तो दूसरी तरफ तुम्हारे सबसे बड़े षत्रु भीष्म तथा द्रोण हैं जो कि अपराजेय हैं तथा पांडव सेना का नाष करने को उद्धत हैं। इस समय ये तुम्हारे आत्मीय अथवा गुरू नहीं, बल्कि तुम्हारे ष्षत्रु रूप में ष्षत्रु पक्ष में खड़े हैं। तुम्हें इनका वध करना होगा अर्जुन,! इन सबका वध करना होगा। प्रभु के इन वाक्यों को सुनकर अर्जुन के हाथ-पाँव फूल गए तथा हृदय काँपने लगा।’’
‘‘इधर धृतराष्ट्र यह सुनते ही प्रसन्न हो उठा कि अर्जुन ने गांडीव रख दिया तथा श्रीकृष्ण षस्त्र ग्रहण नहीं करेंगे तो भीष्म पितामह को पांडवों पर हमला कर नष्ट करके विजयी हो जाना चाहिए। इस पर संजय ने विरोध जताया कि ‘‘ यह तो बड़ा अनुचित कार्य आपने कहा है, और श्रीकृष्ण कौरवों की इस मंषा को पहले ही भाँप गए थे इसीलिए उन्होने कुरूक्षेत्र में काल की गति को रोक दिया है जिससे समस्त कौर-पांडव सेना हाथी-घोड़े सब अपनी जगह स्थिर हो गए हैं तथा श्रीकृष्ण-अर्जुन के इस दिव्य वार्तालाप को सुनने में असमर्थ हैं।’’ इस दिव्य संदेष को सुनने के लिए षिव-पार्वती, देवी-देवता, ग्रह, ऋषि-मुनि आदि सब उत्सुक होकर प्रकट होकर एकाग्रता से सुन रहे थे। जब अर्जुन ने मोहवष भीष्म आदि की ओर देखा तब प्रभु ने अपनी योगमाया के प्रभाव से अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान कर दिखला दिया कि यह सबके ष्षरीर नाषवान तथा पहले से ही मृत्यु का क्षण निष्चित है, तुम तो मारने का निमित्त मात्र हो, तथा आत्मा की अमरता का दर्षन कराया। प्रभु की बातें सुन अर्जुन की की बुद्धि चकरा गयी और वह पाप-पुण्य के निर्णय कर पाने में असमर्थ हो गया तब अश्रुपूरित नेत्रों से हाथ जोड़कर अपने को श्रीकृष्ण के समर्पित कर उन्हे मित्र से गुरू बनाकर अपना उद्धार करने की ‘‘प्रार्थना की। तब प्रभु बोले-‘‘सब धर्मों का त्याग तू करके बस मेरी भक्ति में खोजा मैं हर पाप से मुक्ति दूँगा, इक मेरे षरणागत होजा।’
‘‘ प्रभु ने अर्जुन को समझाया कि ‘‘आत्मा को कोई नष्ट नहीं कर सकता वह तो ष्षरीर का चोला बदलता रहता है। और जन्मों की बात ही क्या इसी एक जन्म में ही मनुष्य का ष्षरीर अनेकों बार बदलता रहता है। पहले बालक फिर किषोर, युवा और अंत में वृद्धावस्था को प्राप्त होकर षरीर सूखे पत्ते के समान झड़ जाता है। तथा यह सुख दुख रोग-द्वेष भी आत्मा को नहीं होते यह तो षरीर को ही होते है और इन सबका, संचालन मन करता है।’’ संजय द्वारा प्रभु की वाणी, उपलब्ध होने पर धृतराष्ट्र बोले कि ‘यह कृष्ण की बातें तो मुझको भी बहकाने लगीं है,, आगे वह क्या बता रहा है?,, संजय फिर बताने लगे। प्रभु बोले ‘‘मन चंचल सारथी की तरह है तो इंद्रिय रूपी घोड़ो को उनके विषयों की तरफ भगाता रहता है तथा आत्मा षरीर में रथी की भांति बैठा रहता है, मनुष्य जब तक जवानी में रहता है तब तक अपने को विषय वासनाओं में उलझाए रखता है, जब जवानी रूपी घी खत्म हो जाता है तब जवानी के पीछे छिपा बुढ़ापा उभर कर सामने आता है और फिर , वह कष्ट से चिल्लाता रहता है।’’ फिर अर्जुन ने व्यग्र होकर पूछा कि मन को वष में करना, तो असंभव है। श्रीकृष्ण बोले नहीं कौन्तेय! कठिन अवष्य है पर असंभव नहीं। यह मन अगर वष में हो जाए तो परमात्मा के पास पहुँचा देता है, अगर रथी रूपी आत्मा आदेष दे तो मन परमात्मा तक, पहुँचने का साधन है।’’ धृतराष्ट्र बोले-‘‘परमात्मा कोे देखना तो मैं भी चाहता हूँ, पर मैं, तो अंधा हूँ,। संजय बोले-‘नहीं महाराज परमात्मा चर्म चक्षुओं से नहीं मन की आँखो से दिखता है परंतु आप मन के अंधे हैं।’’ कृष्ण भक्त संजय ने चतुराई से सत्य बोल दिया। फिर श्रीकृष्ण ने मन को साधने के दो उपाय भी,, बताए, ‘‘अभ्यास और वैराग्य’’
‘‘ प्रभु ने समझाया कि ‘‘मन से सन्यासी हो तथा अपने कर्तव्यकर्म का पालन करो, मन के स्वामी होकर कर्म करो। अनासक्त भाव से। पार्वतीजी को भी भगवान षिव गीता उपदेष का गुढ़ अर्थ स्पष्ट करते जा रहे थे। अर्जुन रिष्तों के मोह में फंसा था बोला ‘‘माना षरीर नष्वर है परंतु रिष्ते तो जीवित रहते हैं जैसे महाराज पांडु का षरीर नष्ट हो गया हैं, परंतु मैं पांडुपुत्र कहलाता हूँ।’’ प्रभु बोले-‘‘यह रिष्ते तुम्हारा मन मानता है क्योंकि वह अज्ञान से घिरा है। ज्ञान से सब स्पष्ट हो जाता है। तुमने महाराज पांडु की बात की तो अब वह किसी भी योनि में होंगे उन्हें तुम्हारे बारे में कुछ न पता होगा। उनकी छोड़ो तुम खुद देखो तुम्हे तुम्हारे पिछले जन्म की याद है कि तुम्हारे अंतकाल में कौन तुम्हारे लिए कितना रोया था। हे अर्जुन! मित्र चार दिन तक रोता है, अन्य रिष्तेदार दस दिन तक और उनसे ज्यादा पत्नी रोती है, परंतु सबसे ज्यादा माँ रोती है। परंतु अर्जुन मेरी माया बड़ी प्रबल है जिस अभिमन्यु को तू अभी पुत्र रूप में देख रहा है क्या पता पिछले जन्म में वह तुम्हारा पिता हो और आने वाले जन्म में षत्रु की तरह तुमसे युद्ध करे। और जिन्हें तू पितामह, गुरू द्रोण आदि की भांति कह रहा है, हो सकता है पिछले जन्म में इन्होने तुम्हारी हत्या की हो और हो सकता है कि तुम अगले जन्म में इनकी हत्या कर दो। षरीर के नाष के साथ ही सारे रिष्ते भी नष्ट हो जाते हैं, तथा चिता के बुझते ही सबके आँसू सूख जाते है और सब फिर अपने कामों में मगन हो जाते हैं, यहाँ तक की सबसे ज्यादा रोने वाली माँ भी फिर से माया-मोह में फँस जाती है। और सब पहले की तरह चलने लगता है। षिवजी पार्वतीजी को समझा रहे हैं कि भगवान श्रीकृष्ण भोंगों से भागने को नहीं कहते। प्रभु ने यह सारी प्रकृति का सौन्दर्य तथा यह ज्ञानेन्द्रियाँ को भी भोग के निमित्त ही तो बनायी है परंतु इनमें आसक्त होने को वे मना करते हैं। योगी तरह भोगों न कि भोगी की तरह। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण इसके उदाहरण हैं वे हर परिस्थिति का सामना करते हैं और सबमें स्थितप्रज्ञ या समभाव से रहते हैं तभी तो वे योगेष्वर कहलाते हैं।’ प्रभु अर्जुन से बोले-‘अपने धर्म का पालन करो और धर्म के पालन के लिए भावनाओं की आवष्यकता नहीं होती, बस कर्तव्य का पालन करना होता है सन्यास अथवा अनासक्त भाव से कर्म कर।’
‘‘ प्रभु ने बड़ा रहस्य खोला कर्मयोग का। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि हर किसी को कर्म तो करना ही होगा और कर्मानुसार फल भी अवष्य ही मिलेगा और इसी प्रकार जीव कर्मबंधन में फंसकर जन्म-जन्मांतर घूमा करता है और परमात्मा से मिल नहीं पाता। अर्थात ‘‘मोक्ष’’ नहीं प्राप्त कर पाता। अर्जुन ने इससे बचने का उपाय पूछा तो प्रभु बोले कि ‘अनासक्ति योग’ से ही बच सकते है। अर्थात केवल अपने निर्धारित धर्म का पालन करें, फल की प्राप्ति के लिए कर्म न करें क्योंकि जरूरी नहीं कि जिस फल की तुम कल्पना कर रहे हो वह तुम्हें मिल ही जाए क्योंकि फल पर तुम्हारा अधिकार नहीं है, फल प्रारब्ध द्वारा निर्धारित होता है। अर्जुन- तो फिर ‘प्रारब्ध’ का निर्धारण आप ही करते हैं? श्रीकृष्ण- नहीं अर्जुन! यह सत्य नहीं हैं। प्रारब्ध अपने किए कर्मों से निर्धारित होता है। कुछ का फल इसी जन्म में मिल जाता है, और कुछ का अगले जन्मों में। मैं किसी के कर्मों और फलों में हस्तक्षेप नहीं करता। अर्जुन- बिना फल की कामना के कर्म क्यों करेगा। श्रीकृष्ण- कर्म केवल कर्तव्य का पालन करने के लिए होना चाहिए। फल जरूरी नहीं तुम्हारे अनुसार हो। जैसे कल्पना करो कि एक धन्ना सेठ खूब स्वादिष्ट भोजन कर रहा हो और पहला निवाला मुँह तक ले जाते हुए बीच में ही पत्नी के हाथ से जो पानी का बर्तन लिए खड़ी है हाथ से छूटकर मुँह पर गिर जाए और लहू बहने लगे तो फिर भोजन न कर पाना ही उसका प्रारब्ध था। इसीलिए कहता हूँ, अनासक्त भाव से कर्म करोगे तो फल के बंधनों से मुक्त रहोगे और कर्मयोगी हो जाओगे, अपने समस्त कर्मफल प्रभु को अर्पित करके कर्मरत रहना भी बहुत उन्नत स्थिति होती है।
आज, प्रभु ने अर्जुन को समझाया कि जरूरी नहीं कि इंद्रियों को नष्ट करने से मन की वासना भी नष्ट हो जाए। दुर्घटनावष किसी की आँखे खराब हो जाने से जरूरी नहीं कि अब वह रूप की कल्पना न करेगा? इसीलिए जो व्यक्ति, बाह्य तौर से तो भोग न करे परंतु मन ही मन विषयों का चिंतन करता रहे वह मिथ्याचारी कहा जाएगा। जबकि मन को बुद्धि द्वारा अपने में स्थिर होकर स्थितप्रज्ञ होकर के विषयों का भोग करते हुए भी उसमें लिप्त न हो वहीं स्थितप्रज्ञ कर्मयोगी होता हैं। अर्जुन ने पूछा कि ’हर जीव की अंतिम लालसा सुख ही तो हैं।’ प्रभु श्रीकृष्ण बोले ’हर जीव के अनुसार सुख की परिभाषा भी बदल जाती है। कोई किसी को सुखी कर सुख पाता है, कोई किसी को दुखी कर सुख पाता है। ऐसा इसलिए होता है कि हर जीव तीन गुणों के वषीभूत होकर जन्म लेता है। रजागुणी में भोग की लालसा प्रबल होती हैं। तमोगुणी आलस्य तथा निर्दयता, क्रूरता जैसी प्रवृति प्रबल होती हैं और सतोगुणी षांतचित्त तथा संतोषमय रहता हैं। यही सबसे श्रेष्ठ अवस्था है। हर प्राणी में तीनों गुण होते हैं, किसी में किसी की गुण प्रधानता और किसी में किसी गुण की। उसी के अनुसार जीव की प्रवृत्ति होती है।’’ प्रभु ने यह भी बताया कि ’कामना ही से दुख-सुख उपजते हैं। एक चक्र की धुरी के आधी तरफ सुख और आधी तरफ दुख रहता है। और यह सुख – दुख का चक्र निरंतर चलता रहता है। सुख आने पर मनुष्य खूब हँसता और दुःख होने पर रोता रहता है। इन कामनाओं पर विजय संतोष धारण करके पायी जा सकती है।’ अर्जुन को भ्रमित होते देख प्रभु उसे आष्वासन देते हुए बोले कि ’सब कुछ भूल कर मेरी षरण में आ जा, मैं तुझे सभी पापों से मुक्त कर दूँगा।’
’’प्रभु, अर्जुन को समझा रहे हैं कि ’हे आर्या। किसी में भी आसक्ति से काम उपजता हैं, उसमें बाधा उपस्थित होने से क्रोध उत्पन्न होता है, क्रोध से बुद्धि भ्रमित हो जाती है और बुद्धि के भ्रमित होने से मनुष्य का सर्वनाष हो जाता हैं।’ फिर प्रभु ने समझाया कि ’इसीलिए मैंने अनासक्ति की बात तुमको बताई क्योंकि या तो मुझे अपने को समर्पित कर के कर्म कर या फिर कर्म करके उसके फल मुझे समर्पित कर दे । तो तू कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा। ’कर्म यज्ञ की तरह करने चाहिए। यज्ञ का अर्थ होता है अपनी प्रिय वस्तु का त्याग। यज्ञ कई प्रकार के होते हैं। जैसे देवताओं को अग्नि के माध्यम से आहुति देना, द्रव्य यज्ञ, ज्ञान यज्ञ। इस सृष्टि में कर्म किए बिना कोई नही रह सकता तो क्यों न यज्ञ की भांति कर्म किया जाए। क्योंकि कर्म के माध्मय, से ही कर्मबंधन भी कट सकते है।’ अर्जुन- हर यज्ञ हर प्राणी नहीं कर सकता। जैसे निर्धन द्रव्ययज्ञ नहीं कर सकता। तो सब यज्ञों में सर्वश्रेष्ठ और सर्वसुलभ यज्ञ कौन हैं। श्रीकृष्ण – हे पार्थ। ज्ञान यज्ञ ही सब यज्ञों में श्रेष्ठ है और ज्ञान की पराकाष्ठा ही भक्ति का मूल है।’ ’जैसे एक गाँव में पहुँचने के दो रास्ते होते हैं। ठीक ऐसे ही परमात्मा की प्राप्ति के लिए भी कर्मयोग और ज्ञानयोग बराबर उपयोगी मार्ग है।’ फिर प्रभु बोले ’जो संसार के लिए रात्रि हैं, उसमें योगी पुरूष जागते हैं।’ ’जैसे एक ही रा़ित्र में भोगी सांसारिक मोह – माया में लिप्त रहता है उसी षांत रात्रि में योगी पुरूष प्रभु ध्यान में मग्न रहता है। भोगी खोता है और योगी पाता है।’ ’ओछा व्यक्ति थोड़ा धन – पद पाने पर नीचता पर उतर आता है परंतु अनासक्त कर्मयोगी इस धन – पद का उपयोग लोक कल्याण के लिए बिना अहंकार के करता हैं। जैसे नदी में पानी बढ़ने पर वह गांव अन्य क्षेत्र तबाह कर देती है परंतु स्थितप्रज्ञ सागर के समान होता है जिसमें कितनी ही नदियाँ समाहित होती हैं पर फिर भी वह स्थिर रहता हैं।’ ’स्थितप्रज्ञ संसार के समस्त भोग भोगता हुआ भी अनासक्त बना रहता है। संसार की दृष्टि में ऐसा योगी और भोगी एक जैसे लगते है पर योगी इसकी चिंता नहीं करता हैं। दोनों का फर्क गहन रात्रि, में ही समझ में आता है।’ फिर प्रभु ने अर्जुन को ब्रह्म प्राप्ति के अन्य मार्ग प्राणायाम, तंत्र, मंत्र और यंत्र के बारे में बताते हुए प्राणायाम योग के गूढ़तम रहस्यों को समझाने लगे।’’