पैदा हर कोई शूद्ध की तरह ही होता है। शूद का अर्थ है जो केवल लेता रहता है, बच्चा हर किसी से केवल लेना जानता है। फिर जब वह वैश्य अर्थात व्यापारी जो लेता-देता दोनों है, उस श्रेणी में आ जाता है, कुछ लोग तो शूद्र बनकर जन्म लेते है और कुछ लोग वैश्य ही बनकर ही मर जाते है। फिर आता है क्षत्रिय अर्थात क्षेत्र का रक्षण करने वाला। अगर व्यक्ति अपने परिवार की समाज की तथा देश की रक्षा नहीं कर सकता तो व्यर्थ है। और फिर आता है ब्राह्मण जिसका अर्थ है कि जिसने ब्रह्म को जान लिया, अपने को जान लिया, तथा अहं ब्रह्मास्मि‘ को समझ लिया, तथा ब्राह्मण है। इसलिए हर किसी को कोशिश करनी चाहिए कि वह इस संसार में शूद्र की तरह आया मगर ब्राह्मण बन कर जाए।
‘ हम जीवन भर दूसरों की चीजों को रटते रहते है और ज्ञानी होने के अभिमान से अहंकार से भरे रहते हैं। किसी ने गीता के श्लोक याद कर लिए, किसी ने ज्ञानेश्वरी रट ली, किसी ने न्यूटन के सिद्धांत पट ली, राम-राम तो तोता भी रट लेता हैं, मगर दूसरो का रटते रहने से महान नहीं बना जा सकता। हमें कुछ अपना बनाना होगा अंतःकरण से निकली चीज को लिखना होगा। भले उल्टी-सीधी हो मगर होगी तो अपनी हीं।
चरवाह सारी गाव की गाय चराता है। यह सब इनकी है और वो तीन गाय उनकी है। सब रट कर याद कर लेता है मगर क्या फायदा। एक अपनी गाय होती, भले ही दुबली-पतली और थोड़ा कम दूध देनेवाली होती मगर अपनी तो होती। इसीलिए हमें अपने जीवनकाल में कम से कम कुछ कविताएं या कुछ लेख तो ऐसे लिखे जो केवल अपने हों उसकी प्रसन्नता अलग ही होती है।‘
‘श्रेश्ठ वही है जो अपने सम्पर्क में आने वाले को भी श्रेश्ठ बनाए।‘
‘शिवाजी ने अपनी आत्मकथा के अंतिम में लिखा है- ‘‘ शम्भाजी शिवाजी की तरह शायद इसलिए नहीं बन पाए क्योंकि उनकी माॅं जीजाबाई की तरह नहीं थी।‘
‘‘‘जैसे बचपन में बच्चा माता-पिता पर हाथ-पैर चलाया करता है परन्तु वे सहन करते है और क्रोधित नहीं होते वरना उसे और प्रेम और वातसल्य की दृष्टि से देखते हैं ठीक उसी प्रकार जब बच्चे बड़े हो जाते हैं और माॅ-बाप उनको डाॅटते फटकारते है तो उन्हें भी आदर और विनम्रता के साथ को्रधित न होते हुए उस डाॅट में से अच्छे व सार तत्व को ग्रहण करते रहना चाहिए जो कि हमारे लिए कल्याणकारी होगा।‘‘
श्यामलता (उमाॅं)
‘माता-पिता बच्चों का लालन-पालन करते समय सकाम भाव से यह सोच कर आद्या जीवन त्यागमय जीते हैं कि बड़ा होकर बच्चा संस्कारवान बनेगा और उनकी सेवा-सुश्रवा करेगा। इसलिए बच्चो को बड़े होकर उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए सुसंस्कृत बनना चाहिए और निष्काम भाव से अपना सब कुछ अर्पण कर देना चाहिए क्योंकि प्रभु ने संसार में तुुुुम्हारे पदापर्ण के लिए तुम्हारे माता-पिता को चुना है और उन्होंने अपने इस कर्तव्य को भली-भांति निभायाहै।‘
-उमाँ

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