Anshuman Bajpayee "Krishnamitra Ji" Spirituality Talks with Krishnamtraji कृष्ण की क्रीड़ाएँ और लीला

   श्रीकृश्ण – पांडव (गीता उपदेष)

अर्जुन को भयभीत होता देख भगवान ने उसे अपने चतुर्भुज रूप के दर्षन दिए। जिसे उसे षांति व आनंद की प्राप्ति हुयी। फिर प्रभु वापस अपने पहले रूप में आ गए। अब अर्जुन का मन षांत हो चुका था। पर कुछ प्रष्न उठ रहे थे। श्रीकृश्ण ने प्रष्न पूछने की आज्ञा दे दी।

अर्जुन – प्रभु आपने कहा था कि वह आपका स्वरूप मेरे मन-बुद्धि के अनुसार है, मतलब आपका असल रूप उसमें भी विषाल और विकराल है?
श्रीकृश्ण – हाँ अर्जुन मेरा असल स्वरूप निराकार है।

अर्जुन – मूर्तिपूजक सही है अथवा आपके निराकार रूप की साधना करने वाले?
श्रीकृश्ण – दोनो ही सही हैं क्योंकि मैं निराकार भी हूँ और भक्तों की आकांक्षा के अनुरूप साकार दर्षन भी देता हूँ। डंडे के सहारे एक-2 पग रखता हुआ भी व्यक्ति अपने परम लक्ष्य तक पहुँच ही जाता है।

अर्जुन – मृत्यु के पष्चात् इस आत्मा की क्या गति होती है?
श्रीकृश्ण – मृत्यु के उपरांत यह आत्मा सूक्ष्म षरीर के संस्कारों के साथ लोक-लोकांतर भ्रमण करता हुआ फिर अपने कर्माें का लेखा जोखा भुगतान करता है। अर्थात् अगर पुण्य कर्म होंगे तो देवलोक में जाकर किन्नर, गंधर्व आदि योनियों में रहकर वहाँ के भोग भोगकर, पुण्य समाप्त होने पर वापस धरती पर आकर पुनः कर्म मे लग जाएगा।
अधिकतर पाप-पुण्य यहीं मनुश्य योनि में रहकर ही भुगते जाते हैं। जैसे – एक सेठ परिवार, कुलीन पुत्र संग आनंद में जीवन बिता रहा है तो वह प्रारब्ध के पुण्य फलों को भोगता है। अब मान लो कि उसके पुत्र की असमय दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है तो उस सेठ को आजीवन नरक से अधिक कश्टमय जीवन बिताएगा तो मानो यह उसके पास कर्माें का फल था जो वह यही भोग रहा है।

अर्जुन – क्या अन्य योनियों में भी वह पाप-पुण्य का संचय कर सकता है?
श्रीकृश्ण – नही अर्जुन यह कर्मयोनि अर्थात मनुश्ययोनि में ही हम कर्म करने में सक्षम हैं और इसी के द्वारा मोक्ष को भी प्राप्त कर सकते हैं। क्योंकि मनुश्य में विवके है। अन्य योनियाँ जैसे सर्प किसी को काट अथवा षेर कितनी हत्याएँ करता है पर इससे उन्हें पाप नहीं लगता।

अर्जुन – प्रभु इस सुश्टि में ऐसी कौन सी जगह है जहाँ जाकर फिर वापस न आना पड़े?
श्रीकृश्ण – वह जगह मेरा परमधाम है जहाँ जाकर फिर वापस नहीं आना पड़ता। अंत समय मनुश्य को चाहिए कि अपने हृदय में स्थित प्राण के साथ मन को एकाग्र करके उसे ऊपर आज्ञाचक्र तक लाना चाहिए तथा फिर ऊँ का लय में धीमे-धीमे उच्चारण करतेे-करते ब्रह्मरंध से प्राण त्यागने वाले चाहें कितना ही पापी क्यों न हों उसे परमधाम की प्राप्ति होती है।
ऐसे ही अन्य कई गूढ़ रहस्यों का प्रभु ने अर्जुन को ज्ञान दिया।
यह सब जान अर्जुन षंात हो गया। तब प्रभु ने उससे कहा कि अगर कोई प्रष्न या जिज्ञासा हो तो उसे पूछ सकता है क्योंकि फिर बाद में ऐसे गूढ़ रहस्यों पर चर्चा संभव न होगी।

अर्जुन ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की है प्रभु! अब मैं सारे संषयों से मुक्त हो गया हूँ। पर प्रभु! अभी तक मैनें आपसे जो कुछ पूछा आपने उसी का उत्तर दिया है पर मैं चाहता हूँ कि आप अपनी ओर से मुझे संक्षेप में कोई उपदेष दें।

तब श्रीकृश्ण बोले कि ’हे अर्जुन संक्षेप में मेरा उपदेष यही है कि, अब तक मैनें तुझसे जो कुछ धर्म, कर्म, ज्ञान, योग आदि विशयों की चर्चा की है, उन सबको भूल जा और केवल एक मेरी षरण में आ जा, मैं तुझे सारे पापों से मुक्त कर दूंगा।’ जैसे कीचड़ में सुना बालक जब रोकर माँ के पास पहुँचता हे तो माँ उसे प्रेम से नहला-धुलाकर साफ कर देती है तथा अपनी वात्सल्यमयी गोद में बिठा लेती है।
भगवान षिव पार्वतीजी से बोले ’वाह प्रभू! ऐसी महान प्रतिज्ञा सिर्फ आप ही ले सकते हैं।’

अर्जुन – ’प्रभु मैनें अपने को पूर्णतया आपके समर्पित कर दिया है। मुझे आज्ञा दें।’
श्रीकृश्ण – ’हे अर्जुन! तू महाभारत पर्व में गाडींव को धारण कर अधर्म का नाष करने को तैयार हो जा वरना आने वाला युग तुझ पर हंसेगा और तुझे न स्वर्ग मिलेगा न ही कीर्ति। इसलिए उठ, और गाडींव की प्रत्यंचा को चढ़ा।’
प्रभु का आदेष पाकर अर्जुन नयी ऊर्जा के साथ गांडीव पर प्रत्यंचा चढ़ाने में तत्पर हो गया।
जय श्रीकृश्ण

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Anshuman Bajpayee "Krishnamitra"