श्रीकृश्ण – पांडव
’इधर बिदुर के गुप्तचर ने पांडवों और कुंती को भिक्षुक के वस्त्र देकर उन्हें नदी द्वारा सुरक्षित दूसरे राज्य में भेजने का प्रबन्ध कर दिया, जिसे सुन अर्जुन उत्तेजित हो उठा फिर युद्धिश्ठिर ने उन्हें षांत किया तथा सब नाव द्वारा रात्रि में ही निकल पड़े। जलते हुए महल को देख नगरवासियों को कुछ षक होने लगा था। हस्तिनापुर में भी हड़कंप मचा था। द्वारिका में भी अक्रूर जी ने यह समाचार जब रोते हुआ सुनाया तो बलराम दुःखी हो परंतु श्रीकृश्ण षांतचित्त बैठे रहे। बलभद्र के कहने पर कृश्ण बोले इसमें आष्चर्य कैसा, यह तो मृत्युलोक है, जो आया है। उसे जाना ही होगा।
बलराम: हमें उनके श्राद्ध के लिए चलना होगा, तथा हस्तिनापुर राज परिवार को सांतवना देनी होगी।
श्रीकृश्ण: मैं तो न जाऊँगा, वहाँ दुःखी है ही कौन? जो उन्हें संातवना दी जाए। पांडवों के जलने के समाचार से यहाँ तक की धृतराश्ट्र के के मन के एक कोने में हर्श उत्पन्न हो रहा है। इससे केवल एक दुःखी होता, कुंती पर अक्रूर जी की खबर के अनुसार वह भी पांडवों के साथ गई, कोई किसी के लिए नहीं रोता, पति-पत्नी, भाई-बहन, सब उतना ही रोते हैं, जितना उन्हें नुक्सान हुआ है, उससे ज्यादा नहीं रोते कि उन्हंे ही नुक्सान हो। सारे रिष्ते-नाते ऐसे ही है। केवल एक रिष्ता ऐसा है तो पूर्णतः निःस्वार्थ है वह है – माँ, वह हमेषा तन मन धन से बच्चे का कल्याण चाहती है।
बलराम: वह तो ठीक है। पर तुम्हारी निष्चिंतता आष्चर्य में डालती है। अच्छा यह बताओं कि अर्जुन तो तुम्हारा भक्त है, वह कैसे नश्ट हो सकता है। फिर तुमने इंद्र को भी उसकी रक्षा का वचन दिया था?
कृश्ण: यह सत्य है। और मेरे द्वारा रक्षित का नाष कैसे हो सकता है।
यह संकेत पा कर बलराम और अक्रूर गद्गद् हो गए और श्रीकृश्ण को प्रणाम किया। विदुर ने भी गुप्त रूप से दुःखी भीश्म को पाण्डवों के सुरक्षित होने का समाचार दिया। जिससे वे भी प्रसन्न हो गए।
इधर गांव में भिक्षा से लाए अन्न का माता कुंती आधा भोजन भीम को तथा आधे से बाकी लोग करते थे। एक बार जिस घर में ठहरे थे कुछ रोने की आवाज सुन कुंती ने पता किया तो एक राक्षस ने लोगों से कहा है कि अगर सामुहिक रक्तपात से बचना है तो हर रोज एक टुकड़ा अनाज और एक आदमी भोजन के लिए पहुँचाया जाए। तथा आज गांववालों के अनुबंध को पूरा करने के लिए उनके घर से एक आदमी आज जाएगा। यह सुन कुुंती ने अपने एक पुत्र को भेजने को कहा रोकने पर यह बताया कि इसके पास एक मंत्र है जिससे यह किसी भी राक्षक को हरा या मार सकता है। फिर भीम टुकड़े पर रखी खीर और भोजन खाते जाते और खाली बर्तन राक्षस पर फेंक देते, फिर दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। भीम ने अपना षरीर फुला लिया और युद्ध में राक्षस को चट्टान पर पटक कर मार दिया और गांव को आतंक से मुक्त किया। अब अज्ञात रूप से भगवान श्रीकृश्ण की कृपा से यह सब हो रहा है।
जय श्री कृश्णः
