Anshuman Bajpayee "Krishnamitra Ji" Spirituality Talks with Krishnamtraji कृष्ण की क्रीड़ाएँ और लीला

श्रीकृश्ण पांडव दिब्य संवाद

’’प्रभु अर्जुन को समझा रहे है कि ’हे आर्य। किसी में भी आसक्ति से काम उपजता है, उसमें बाधा उपस्थित होने से क्रोध उत्पन्न होता है, क्रोध से बुद्धि भ्रमित हो जाती है और बुद्धि के भ्रमित होने से मनुश्य का सर्वनाष हो जाता है।’ फिर प्रभु ने समझाया कि ’इसीलिए मैनें अनासक्ति की बात तुमको बताई क्योंकि या तो मुझे अपने को समर्पित कर के कर्म कर या फिर कर्म करके उसके फल मुझे समर्पित कर दे ।तो तू कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा।’
’कर्म यज्ञ की तरह करने चाहिए। यज्ञ का अर्थ होता है। अपनी प्रिय वस्तु का त्या। यज्ञ कई प्रकार के हेाते हैं। जैसे देवताओं को अग्नि के माध्यम से आहुति देना, द्रव्य यज्ञ, ज्ञान यज्ञ। इस सृश्टि में कर्म किए बिना कोई नही रह सकता तो क्यों न यज्ञ की भांति कर्म किया जाए।
क्योंकि कर्म के माध्यम से ही कर्मबंधन भी कर सकते है।’

अर्जुन – ’हर यज्ञ हर प्राणी नहीं कर सकता। जैसे निर्धन द्रव्ययज्ञ नहीं कर सकता। तो सब यज्ञों में सर्वश्रेश्ठ और सर्वसुलभ यज्ञ कौन है।

श्रीकृश्ण – ’हे पार्थ। ज्ञान यज्ञ ही सब यज्ञों में श्रेश्ठ है और ज्ञान की पराकाश्ठा ही भक्ति का मूल है।’
’जैसे एक गांव में पहुंचने के दो रास्ते होते हैं। ठीक ऐसे ही परमात्मा की प्राप्ति के लिए भी कर्मयोग और ज्ञायोग बराबर उपयोगी मार्ग है।’
फिर प्रभु बोले ’जो संसार के लिए रात्रि है, उसमें योगी पुरूश जागते हैं।’ जैसे एक ही रात्रि में भोगी सांसरिक मोह-माया में लिप्त रहता है उसी षांत रात्रि में योगी पुरूश प्रभु ध्यान में मग्न रहता है। भोगी खोता है और योगी पाता है।’
’ओछा व्यक्ति थोड़ा धनपद पाने पर नीचता पर उतर आता है परंतु अनासक्त कर्मयोगी इस धन-पद का उपयोग लोक कल्याण के लिए बिना अहंकार के करता है।
जैसे नदी में पानी बढ़ने पर वह गांव अन्य क्षेत्र तबाह कर देती है परंतु स्थितप्रज्ञ सागर के समान होता है जिसमें कितनी ही नदियाँ समाहित होती हैं पर फिर भी वह स्थिर रहता है।’
’स्थितप्रज्ञ संसार के समस्त भोग भोगता हुआ भी अनासक्त बना रहता है। संसार की दृश्टि में ऐसा योगी और भोगी एक जैसे लगते हैं पर योगी इसकी चिंता नहीं करता है। दोनों का फर्क गहन रात्रि, में ही समझ में आता है।’

फिर प्रभु ने अर्जुन को ब्रह्म प्राप्ति के अन्य मार्ग प्राणायाम, तंत्र मंत्र और यंत्र के बारे में बताते हुए प्राणायाम योग के गूढ़तम रहस्यों को समझाने लगे।’’
जय श्रीकृश्ण

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Anshuman Bajpayee "Krishnamitra"