श्रीकृश्ण – पांडव
“लाक्षागृह वाली योजना की घटना का पता विदुर को गुप्त रूप से गुप्तचरों द्वारा ज्ञात हुआ। तो विदुर जी ने अपने कुछ खास आदमियों को तेज घोड़े पर चढ़कर पांडवों से पहले पहुंचकर सुरंग बनाने की आज्ञा दी। पांडवों से एक दिन पहले बिदुर जी के गुप्तचर वार्णावर्त पहुंच कर अपना कार्य षुरू किया। योजनानुसार तय हुआ कि रातभर में महल से नदी के किनारे तक सुरंग खोदी जाएगी क्योकि यह तय था कि महल मंे आग लगाने से के बाद सैनिक महल घेरकर खड़े होंगे तो चुपचाप नदी से नाव में सबको निकाल दिया जाएगा। इधर लाक्षागृह में षकुनि के आदमी था। सैनिक कहलें, सेवक के भेश में तैयार थे तथा एक स्त्री सैरंध्री वेश में कुंती के लिए नियुक्त थी, और तय हुआ कि राम में दूध में बेहोषी की दवा मिलकर बेहोष करने के बाद महल में आग लगाई जायेगी और सेवक कोयल की आवाज पर भाग जायेंगे। तभी षाम को पाण्डव महल पहुंच गए। उनके सेवकों के भेश मंे विदुर के गुप्तचर भी महल में जाकर छिप गए। रात्रि में जब सब सो गए तभी छिपे हुए एक गुप्तचर की आहट पाकर षकुनि के सैनिक टूट पड़े फिर विदुर के तीनों गुप्तचरों तथा षकुनि के सैनिक जो सेवक रूप में थे युद्ध षुरू हो गया षकुनि के सैनिक मारे गए पर तभी आहट पाकर भीम जाग गए और विदुर के एक गुप्तचर को दुष्मन समझकर दबोच लिया तभी चारों पांडव और कुंती आ गए फिर उनके कहने पर छोड़ा तब गुप्तचर ने उन्हें बिदुर जी का लिखा हुआ पत्र दिखलाकर सारी साजिष बताई। समय कम देखकर सबने मिलकर अंदर से खुदाई षुरू की, उधर बाहर से कोयल की आवाज निकालने पर जब सेवक नहीं निकले तो आग लगा दी गयी मगर तब तक पांडव लोग ब्राह्मण वेष में नदी तट पर आ गए चूंकि पांडव वेश छिपाकर घूमने से दूर्याेधन फिर उन्हें मारने का प्रयत्न करता। इधर बिदुर भगवान से पाण्डवों की रक्षार्थ करूणा से व्याकुल थे। यह देख श्रीकृश्ण हंस पड़े। बलराम के पूछने पर बताया कि विदुर जैसे ज्ञानी भी मोहित हो जाते हैं। बलराम यह तो तुम्हारी माया का खेल है। श्रीकृश्ण (हंसकर): हाँ, वो तो है। परंतु जो मेरी षरण में हैं, उन्हें भला कोई कैसे नुक्सान पहुँचा सकता है।
जय श्रीकृश्ण
