Anshuman Bajpayee "Krishnamitra Ji" India's Gifts to the World Secrets of India Spirituality

“मूर्ति पूजा की वैज्ञानिकता”

“एक हिंदू के लिए उसके ईट की मूर्ति ही सब कुछ होती है। हिंदू धर्म का प्यारा बच्चा ईसाई मत भी इसी बात से सहमत पाया जाता है पर इस्लाम आदि विद्रोही बच्चे अपने को ईष्वर के निराकार स्वरूप को सत्य मान उसकी पूजा कर मूर्तिपूजकों का उपहास उड़ाता है। पर एक योगी या विद्वान हिंदू उनके बचपनें पर हंसता है। एक हिंदू के लिए मूर्तिपूजा पूर्ण परमात्मा तथा संपूर्ण प्रकृति की आराधना है। जैसा कि कहा गया है कि ’जो ब्रह्याण्ड में है वह सब इस पिण्ड में भी है।’ अब सब जानते हैं कि इस समस्त सृश्टि की हर वस्तु पंचभौतिक पदार्थ से बनी है – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाष। अब जो अन्य मत वाले हैं वह मुंह से चाहें जितना निराकार – निराकार चिल्ला ले पर बिना परमात्मा के साथ एकाकार हुए बिना निराकार का अनुभव नहीं ला सकते, और फिर उसको मुंह से बता नहीं सकते। तभी हिंदू योगी मुंह से ईष्वर के बारे में उपदेष कम, वरन् वह आपसे कहेगा कि यह लो कुंजी, ताला खोलो और नजारा स्वंय देख लो। बाकि तो दस बीवियों और साठ बच्चों को पैदा करके दुनिया की चूं-चूपड़ में लिप्त रहने वाले आम आदमी के मुंह से निराकार ईष्वर षब्द सुनकर हंसी आती है ।
उससे पहले तो तुम्हें ईष-भक्ति के प्रथम चरण मूर्ति-पूजा से षुरूआत करनी होगी।

रहस्य यह है कि एक मूर्ति में संपूर्ण प्रकृति समाहित है
    मिट्टी –                                     पृथ्वी तत्व
   जल से गूंथना –                         जल तत्व
   हवा में सूखना –                       वायु तत्व
   आग में पकाना –                      अग्नि तत्व
   प्राण प्रतिश्ठा –                        आकाष तत्व

तो इस तरह भक्त मूर्ति के द्वारा : प्रकृति से होता हुआ परमात्मा को प्राप्त करता है। पहले उस मूर्ति में परमात्मा नजर आता है फिर वह मूर्ति हर जगर नजर आती है, तत्पष्चात् मूर्ति हट जाती है और  फिर वह अनुभव में आता है जिसे रामकृश्ण परमहंस, मीराबाई, चैतन्य तथा परमहंस योगानंद जैसे लोगों में महसूस किया है और अन्य को उसकी कुंजी बताई है। इसीलिए मूर्ति का आगे का हिस्सा साकार और पीछे का निराकार होता है।
इसीलिए मूर्तिपूजा के माध्यम से भक्त संपूर्ण प्रकृति तथा परमात्मा की षक्ति से अपने अंतस्थल के विकारों को भस्म करके अपनी पवित्र आत्म को महिमामन्डित कर प्रकट करता है। जैसे सूर्य की ऊर्जा से अग्नि उत्पन्न कर कागज को जला सकते हैं या विद्युत ऊर्जा उत्पन्न कर रोषनी तथा मनोरंजन के कार्य में उपयोग ला सकते हैं।
इसलिए अन्य की तरह हिंदू धर्म किसी एक चीज के प्रति हठ या अंधापन नहीं करता, कि यह पूंछ ही हाथी हैं या यह पांव ही हाथी है, सूंड ही हाथी हैं, पेट ही हाथी है, बल्कि हिंदू धर्म सब कुछ समाहित कर लेता है कि यह हाथी की पूंछ है, यह हाथी का पेट है, इत्यादि क्योंकि वह जानता है कि सब कुछ ईष्वर में है, और ईष्वर सब में हैं । इसीलिए ’प्रेम’ ज्ञान से बड़ा होता हैं, क्यांकित ज्ञान और बुद्धि की सीमा होती है, परंतु प्रेम और भक्त का हृदय असीम अनंत होता है।”

 “सिर्फ नाम, लेकर रह गया।
यह दीवाना, बहुत कुछ कह गया।”

                                                                                                                                                                              जय श्रीकृष्ण:!

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Anshuman Bajpayee "Krishnamitra"