महाभारत (मातृ शक्ति को समर्पित महागाथा) 
महाभारत का प्राचीन नाम जय संघिता हैं। महाभारत को विश्व का सबसे वृहद महा काव्य होने का गौरव प्राप्त हैं। आचार्य चाणक्य का मत है गुरू से पिता सौ गुना आदरणीय है और पिता से माता सहस्त्र गुना पूजनीय है। शायद यही कारण है जो इस महाकाव्य की तुलना कोई नहीं कर पाया।
इस ग्रन्थ के रचयिता भगवान गणेश और वेदव्यास जी की मातृभक्ति तो जग प्रसिद्ध है ही। गणेश जी तो मातृकृपा से प्रथम पूज्य बन गये वही वेदव्यास जी ने माँ सत्यवती के अनुरोध पर कुरूवंश को आगें बढाने की प्रेरणा दी।
इस ग्रन्थ का हर नारी पात्र अपने आप में असीमित शक्ति सम्पन्न है। इसकी शुरूआत होती है। ‘पृथ्वी माता से जो गाय का रूप धारण करके ईश्वर के समक्ष धर्म स्थापना की प्रार्थना करती हैं‘। तत्पश्चात माँ गंगा ने शापग्रस्त आठ वस्तुओं को मुक्ति का आश्वासन दिया है उनमें से सात वसुओं को तो गंगा जी ने जन्म लेते ही अपनी धारा में मुक्ति प्रदान की वहीं आठवें पुत्र को मुक्त करते समय राजा शान्तनु के द्वारा प्रतिज्ञा भंग करने से आठवाँ वसु को पृथ्वी पर ही रहना पड़ा।
परन्तु माँ गंगा ने बचपन में बालक को अपने ही सरंक्षण मे रखा और अपने पुत्र को देवगुरू बृहस्पति और शुक्राचार्य से दिव्य ज्ञान दिलवाया तथा भगवान परशुराम जी से अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दिलवा कर 25 वर्ष की आयु होने पर उसके पिता शांन्तनु तथा कुरूराष्ट्र की सेवा की आज्ञा प्रदान की तथा यह वचन दिया कि जब उसे माँ की शिक्षा तथा सहारे की जरूरत होगी तो माँ गंगा प्रत्यक्ष दर्शन देकर उसे संतुष्ट करेंगी। वही माँ गंगा का पुत्र भविष्य में अपनी महान अखण्ड ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा के कारण भीष्म नाम से प्रसिद्ध हुआ और आजीवन माँ की आज्ञा का पालन किया।
महाभारत में कुन्ती के पांँचो पुत्र युद्धिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, और सहदेव (जो कि राजा पाण्डु की दूसरी पत्नी माद्री के पुत्र थे) सदैव कुन्ती की आज्ञा का पालन करते रहे तथा दुर्योधन और शकुनी के भड़कने पर भी अपनी आपसी एकता तो बनाऐ रखा।
इसी तरह रानी सत्यवती एवं द्रौपदी भी महाभारत की सशक्त एवं बुद्धिमान महिला पात्र है।
महाभारत को पंचम वेद की संज्ञा दी गयी है। समाज के कुछ अज्ञानी एवं अल्पबुद्धि लोगों ने महाभात के संबंध में कई भ्रम फैला रखे है, जैसे- बाल्मिकि, रामायण के संम्बन्ध में भी कई भ्रम व्याप्त है, क्योकि ऐसे लोगों ने न ही कभी महाभारत जैसे दिव्य इतिहास ग्रन्थ का न अध्ययन किया है और न ही उसके गूढ़ श्लोकों का मनन किया है।
अपितु महाभारत तो हमें भीष्म जैसा सदचरित्र, पांडवो जैसी भातृप्रेम एवं श्रीभद्भवदगीता जैसा विश्वप्रसिद्ध एवं दिव्य ग्रन्थ प्रदान किया है। 
फिर इस ग्रन्थ का महा नायक भी तो स्वयं ईश्वर श्रीकृष्ण हैं जिन्होंने न जाने कितने राक्षसों का वध किया परन्तु माँ यशोदा की डाॅट से ऐसे भयभीत होकर गोद में दुबकते कि माँ का हृदय वात्सल्य से सराबोर हो जाता।
तो आप इस श्लोक पर स्वयं विचार कीजिए कि इस परम पावन एवं दिव्य ग्रन्थ के चिन्तन मनन से हमें साक्षात मोक्ष का मार्ग प्रशस्त्र होता है।
‘‘यथा समुद्रो भगवान यथा च हिमवान् मिरिः।
ख्यातावुभौ रलनिधि तथा भारत मुच्यते।।
इमं भारतसावित्रीं प्रातरूत्थाय यः पठेत्।
सः भारतफलं प्राप्य परं ब्रह्माधिगच्छति’’।।
‘‘जैसे समुद्र और हिमालय दोनों ही रत्नों की निधि माने गये है, उसी प्रकार नाना प्रकार के उपदेश रूपी रत्नों का भण्डार है यह महाभारत! इस महाभारत रूपी पन्चमवेद का जो प्रातः उठकर पारायण करता है, वह ज्ञान के परमफल-मुक्ति को प्राप्त होता है’’।
जय श्रीकृष्ण
कृष्ण मित्र
